Govansh ki durdasha गोवंश की दुर्दशा

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भारतीय संस्कृतिमें (govansh) गायको माँका स्वरूप माना गया है। वैज्ञानिकोंने भी यह सिद्ध किया है कि बच्चेके लिये माँके दूधके बाद गायका दूध ही सबसे अच्छा आहार है।

भारतीय संस्कृति में गाय का महत्व और गोवंश की महिमा

हमारे कृषिप्रधान देश में गोपालन अर्थ-उपार्जन में भी अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। गोपालकों के लिये तो मुख्य रूपसे गाय ही परिवार चलाने (जीविकोपार्जन) का मुख्य साधन है। शास्त्रोंमें जो गौकी महिमा आयी है, वह छिपी नहीं है। लोकजीवनमें भी गौ हर तरहसे अनुस्यूत है। इतना सब होते हुए भी क्या कारण है कि गायोंकी दिनोंदिन दुर्दशा ही हो रही है?

गायों को आर्थिक दृष्टि से उपयोगी कैसे बनाएं?

इस पर विचार करें तो एक बात समझमें आती है कि आजके इस आर्थिक युग में गाय जब तक आर्थिक दृष्टिकोणसे उपयोगी साबित नहीं होगी तबतक इसकी दशा सुधरनी मुश्किल है। गायके साथ गोपालक के परिवार की आर्थिक व्यवस्था प्रत्यक्ष रूपसे जुड़ी हुई है।

प्राचीन भारत में गाय पालन की व्यवस्था और सीख

इसपर विचार के लिये हमें थोड़ा पीछेका इतिहास पलटना होगा कि पहले लोग बड़ी संख्या में किस प्रकार गायोंको रखते थे ? हर घरमें गायका होना मानो जरूरी था, दूध-दही की नदियाँ बहती थीं। राजस्थानमें तो साख-सम्बन्ध करते वक्त यह कहावत थी कि ‘धीणो घणोही है बेटी सोरी रेसी’ जिसके यहाँ जितनी अधिक गायें होतीं, वह परिवार उतना ही आर्थिकसम्पन्न माना जाता। नन्द बाबा के पास नौ लाख गायें थीं।

उनके राज्यमें सारी प्रजा सुखी-समृद्ध थी। लोगोंमें परस्पर इतना अपनत्व और प्रेम था कि किसीके घर किसी कारणवश दूध-दही या बिलौना नहीं होता तो उन्हें छाछ ले जानेका संदेश भिजवाते। आज गाय पालना महँगा पड़नेके कारण धीरे-धीरे सभी जन इस व्यवसाय से पीछे हट रहे हैं और गायोंकी स्थिति दयनीय होती जा रही है।

अब पुनः प्रश्न उठता है कि हमारे पूर्वज किस व्यवस्थाके अन्तर्गत इतनी संख्यामें गायें रखते थे। इसके लिये निम्न चार बातोंपर हमें ध्यान देना होगा-

(१) स्वयंद्वारा परिश्रम,

(२) गोचरभूमियोंको सुधारकर उसमें चरागाह विकसित करना,

(३) अच्छे किस्मके साँड़ तैयार करके देशी नस्लमें सुधार लाना ताकि गायें दुधारू हों और

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(४) गोपालकोंको दूध, घी अथवा पंचगव्य उत्पादोंका सही भाव मिल सके, ऐसी व्यवस्था करना।

गोचर भूमि का संरक्षण और उसके फायदे

हमारे पूर्वज निष्ठापूर्वक अपने हाथों से गायों की देखभाल करते थे। अपने खेतोंमें गायोंके खानेका चारा उगानेके लिये अलगसे व्यवस्था रखते थे, जिससे गायें खेतोंमें विचरण करके हरी घास चर लेतीं, खेती समाप्त होनेके बाद खलिहानोंसे तथा खेतोंमें उगा हुआ घास-फूस इकट्ठा करके घरपर लाकर सालभरके लिये गायोंके लिये घासकी व्यवस्था कर लेते।

इसके पश्चात् खेतोंमें बचे-खुचे घास-फूसको चरनेके लिये गाँवोंमें चरवाहे (गौरी) की व्यवस्था होती थी जो गायोंको खेतोंमें चरानेके लिये ले जाता, करीब दो माहतक पेट भरकर गायें सभी खेतोंमें खुलेमें चरकर आतीं, इससे गोपालकको घास-चारा खरीदनेका आर्थिक बोझ नहीं पड़ता, साथ ही इनके गोबरसे खेतोंकी जमीनकी उर्वरा शक्ति भी अच्छी रहती थी। उस समय खेती बैलोंद्वारा की जाती थी, लेकिन आज बैलोंका स्थान ट्रैक्टरोंने ले लिया है। ट्रैक्टरोंद्वारा खेती होनेसे गोवंश तथा किसान दोनोंका भयंकर नुकसान हुआ है।

बेकार बैल बूचड़खानोंमें कटने जाने लगे और किसान कम परिश्रमी होता गया। ट्रैक्टरों द्वारा खेती होनेसे घास-फूसके पौधे जड़सहित उखड़नेके कारण खेतोंमें घास होना प्रायः बन्द हो गया है। आज ऊर्जाके स्रोतकी न्यूनताके कारण वा खेती बहुत महँगी पड़ने लगी। साथ ही घास-चारेके नहीं उगनेके कारण गोवंशकी दुर्दशा होने लगी। खेतीमें रसायनोंके प्रयोगसे पशुधन और मानव अनेक तरहकी बीमारियोंका शिकार होते जा रहे हैं।

परिवारमें गायें पालनेमें घरकी महिलाओंका भी बड़ा योगदान रहता था। दूध दुहना, बिलौना करना, घरपर गायोंकी देख-रेखका कार्य प्रायः महिलाएँ कर लेती थीं, लेकिन आज यह बात नहीं रह गयी है। परिवारोंमें गायें रखना धीरे-धीरे बन्द-सा हो गया।

अतः हमें चाहिये कि हम सरकार एवं दानदाताओंके भरोसे न रहकर स्वयंद्वारा परिश्रम करके पूर्वजोंकी इस प्रक्रियाको पुनः दोहराकर जैविक खेती-बैलोंद्वारा खेतोंमें घास उगाकर, परिवारमें गायें रखकर गोवंशको बचायें।

(२) पहले हर गाँवमें गायोंके चरानेके लिये गोचरभूमियोंकी व्यवस्था होती थी, जिसका अच्छी तरहसे रखरखाव और उसकी सुरक्षा करना हर व्यक्ति अपना कर्तव्य समझता था। आज गोचरभूमियाँ हम खत्म करते जा रहे हैं और बची हुई भूमिकी कोई देखभाल नहीं है। यह बात भी सही है कि पिछले वर्षोंमें अकालकी स्थितिके कारण गोचरभूमियोंकी भी बड़ी दुर्दशा हुई है।

फिर भी हाथ-पर-हाथ रखकर बैठनेसे इस समस्याका समाधान नहीं होगा। हमें गोचरभूमियोंको जोतकर और उसमें प्रकृतिके अनुरूप घास लगाकर पुनः विकसित करना होगा। गोचरभूमिमें स्वच्छन्द वातावरणमें गायें चरनेसे गायें जहाँ स्वस्थ रहती हैं, वहीं उन्हें तरह- तरहकी वनस्पति चरनेके लिये मिलनेसे दूध स्वास्थ्यवर्धक एवं ज्यादा होता है, जिससे गोपालकपर आर्थिक बोझ कम आता है।

(३) पहले हर गाँवमें अच्छे नस्लके देशी साँड़ पूर्वज लोग रखा करते थे। साँड़को गुड़, रोटी देना तथा उसकी देख-रेख करना हर ग्रामवासी अपना धर्म समझता था। अच्छी नस्लके साँड़से गायें भी स्वस्थ एवं दुधारू होती थीं, लेकिन अब गाँवोंमें नस्लकी बात तो दर साँड़ भी देखनेको कम मिलते हैं। निरन्तर अकालकी स्थितिके कारण पौष्टिक आहार नहीं मिलनेसे गोवंश कमजोर होता चला गया। आज गायोंका दूध इतना कम हो गया कि गोपालकको दूधकी मिलनेवाली कीमतसे पौष्टिक आहार तो दूर घास-चारेकी व्यवस्था करना भी मुश्किल पड़ता है।

इसके लिये उपयोगी साँड़ तैयार करके नस्लसुधार करना बहुत जरूरी हो गया है। हर गाँवमें अच्छी नस्लके साँड़ रखकर हमें पुनः दुधारू गाय तैयार करना होगा।

(४) गो-उत्पादोंका उचित मूल्य नहीं मिल रहा है। आज शहरोंकी अपेक्षा गाँवोंमें दूध-घीका मूल्य गोपालकको बहुत कम मिलता है।

इसके लिये गाँवोंमें सहकारी समितियाँ बनाकर गोपालकोंको अपने उत्पादनका उचित मूल्य मिल सके, ऐसी व्यवस्था करनी होगी।

हमारे शास्त्रोंमें गायके पञ्चगव्यसे स्वास्थ्यलाभ एवं वातावरण शुद्ध होनेका बहुत महत्त्व बताया गया है। दूध, दही, घीके अलावा देशी गायका गोमूत्र तथा गोमय अनेक तरहकी बीमारियों; जैसे-दमा, सूगर, कैंसरमें बहुत लाभकारी सिद्ध हुआ है।

हम सभीको तथा सरकारको चाहिये कि देशी गायके गोमूत्र और गोमयके गुणवत्ताकी अच्छी तरह जाँचकर इसका फार्मूला तैयार करके जिन रोगोंमें यह लाभकारी हो, उसकी दवाइयाँ बनाकर जनमानसको स्वास्थ्यमें होनेवाले लाभके बारेमें जानकारी दें। आज करोड़ों रुपये अंग्रेजी दवाइयोंमें खर्च होते हैं, किंतु यदि यह सस्ता इलाज जनताके लिये लाभकारी हो तो इससे मानव तथा गोवंश दोनोंकी रक्षा हो सकती है।

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FAQs-

1. गायों की दुर्दशा के प्रमुख कारण क्या हैं?

गोचर भूमि की कमी।
आर्थिक दृष्टिकोण से गायें कम उपयोगी हो रही हैं।
ट्रैक्टरों के कारण बैलों और गोवंश का महत्व घटा है।
रासायनिक खेती से पशुधन और मनुष्यों पर नकारात्मक प्रभाव।
दुग्ध उत्पादों का उचित मूल्य नहीं मिलना।

2. गायों को आर्थिक दृष्टिकोण से उपयोगी कैसे बनाया जा सकता है?

जैविक खेती को बढ़ावा देकर।
पंचगव्य उत्पादों का उत्पादन और बाजार में उचित मूल्य सुनिश्चित करके।
नस्ल सुधार के लिए अच्छे साँड़ों का पालन।
सहकारी समितियों द्वारा गोपालकों को समर्थन।

3. गोचर भूमि का महत्व क्या है?

गोचर भूमि गायों के चरने और उनके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। यह दूध की गुणवत्ता बढ़ाने में भी सहायक है।

4. गायों की देखभाल के लिए परिवार का योगदान कैसे सुनिश्चित करें?

घर में जैविक चारे की व्यवस्था।
परंपरागत प्रक्रियाओं का पालन।
परिवार की महिलाओं की भागीदारी।

5. पंचगव्य उत्पादों का क्या महत्व है?

पंचगव्य (दूध, दही, घी, गोमूत्र, गोमय) स्वास्थ्य के लिए लाभकारी हैं। गोमूत्र और गोमय से कैंसर, डायबिटीज, और अस्थमा जैसी बीमारियों में लाभ होता है।

6. नस्ल सुधार के लिए क्या किया जा सकता है?

प्रत्येक गाँव में अच्छे नस्ल के साँड़ों की व्यवस्था।
पौष्टिक आहार देकर गोवंश की सेहत सुधारना।
दुधारू गायों की संख्या बढ़ाना।

7. गायों के दुग्ध उत्पादों का मूल्य कैसे बढ़ाया जा सकता है?

सहकारी समितियों का गठन।
सीधे बाजार में उत्पाद बेचने की व्यवस्था।
दूध-घी और अन्य उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार।

8. गोवंश संरक्षण के लिए सरकार और समाज की भूमिका क्या होनी चाहिए?

गोचर भूमि का विकास।
जैविक खेती और गोपालन को बढ़ावा देने के लिए सब्सिडी।
पंचगव्य उत्पादों के लाभ पर जागरूकता अभियान।

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Deepika Patidar
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Deepika patidar is a dedicated blogger who explores Hindu mythology through ancient texts, bringing timeless stories and spiritual wisdom to life with passion and authenticity.

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