हर साल, जब भाद्रपद महीने की अँधेरी रातें घनी होती हैं और कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि आती है, तो सम्पूर्ण भारत में एक अलौकिक ऊर्जा और आनंद की लहर दौड़ जाती है। यह समय है श्री कृष्ण Janmashtami का, उस दिन का उत्सव जब भगवान विष्णु ने श्री कृष्ण के रूप में धरती पर अवतार लिया था। मंदिरों से गूंजती घंटियों की ध्वनि, भक्तों द्वारा गाए जा रहे भजन, और “हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की” के जयकारे वातावरण को भक्ति-रस से सराबोर कर देते हैं।
परन्तु जन्माष्टमी का त्योहार केवल श्री कृष्ण के जन्मदिन का जश्न मनाने तक ही सीमित नहीं है। यह एक गहरा आध्यात्मिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक उत्सव है, जिसका प्रत्येक पहलू मानव जीवन के लिए एक महान संदेश लिए हुए है। इस त्योहार के मूल को समझने के लिए, हमें उस काल में जाना होगा जब पृथ्वी पर अधर्म और अत्याचार अपने चरम पर था।
कृष्ण जन्म की अलौकिक गाथा: अंधकार में आशा की किरण
जन्माष्टमी की कथा का केंद्र है मथुरा नगरी और उसका अत्याचारी राजा, कंस। कंस अपनी शक्ति के मद में चूर था, किन्तु उसके मन में एक गहरा भय बैठा हुआ था। यह भय एक आकाशवाणी से उत्पन्न हुआ था, जिसने यह भविष्यवाणी की थी कि उसकी अपनी ही बहन, देवकी, की आठवीं संतान उसकी मृत्यु का कारण बनेगी। इस भविष्यवाणी ने कंस को इतना भयभीत कर दिया कि उसने अपनी प्रिय बहन देवकी और उनके पति वासुदेव को तत्काल कारागार में डाल दिया। उसने मानवता की सभी सीमाओं को लांघते हुए यह निश्चय किया कि वह देवकी की प्रत्येक संतान को जन्म लेते ही समाप्त कर देगा।
एक के बाद एक, देवकी ने सात संतानों को जन्म दिया, और हर बार क्रूर कंस उस मासूम को उनके माता-पिता की आँखों के सामने ही पत्थर पर पटक कर मार देता। कारागार की दीवारें देवकी और वासुदेव के विलाप की साक्षी थीं। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो पृथ्वी पर से धर्म और न्याय का अस्तित्व ही समाप्त हो गया है। फिर वह घड़ी आई, जब देवकी ने अपनी आठवीं संतान को गर्भ में धारण किया।
जिस रात्रि भगवान कृष्ण का जन्म हुआ, वह कोई साधारण रात्रि नहीं थी। बाहर मूसलाधार वर्षा हो रही थी, बिजलियाँ कड़क रही थीं, और यमुना नदी उफान पर थी। अर्धरात्रि के समय, जब सम्पूर्ण मथुरा नगरी सो रही थी, तब कंस के कारागार में एक दिव्य प्रकाश फैला। देवकी ने एक अद्भुत शिशु को जन्म दिया, जिनके चतुर्भुज रूप में शंख, चक्र, गदा और पद्म थे। उनके इस अलौकिक रूप को देखकर देवकी और वासुदेव समझ गए कि यह कोई साधारण बालक नहीं, अपितु स्वयं परमात्मा हैं।
उसी क्षण एक चमत्कार हुआ। कारागार के भारी-भरकम द्वार स्वतः खुल गए, और सभी पहरेदार गहरी निद्रा में सो गए। वासुदेव को यह आदेश मिला कि वे इस बालक को यमुना पार करके गोकुल में अपने मित्र नन्द बाबा के घर छोड़ आएं, जहाँ उनकी पत्नी यशोदा ने भी एक पुत्री को जन्म दिया था। एक टोकरी में नन्हे कृष्ण को लेकर वासुदेव उस अँधेरी और तूफानी रात में निकल पड़े।
जब वे उफान मारती यमुना के तट पर पहुँचे, तो नदी ने उनके लिए मार्ग दे दिया। शेषनाग ने स्वयं अपने फणों से छत्र बनाकर उन्हें वर्षा से बचाया। यह सम्पूर्ण दृश्य इस बात का प्रतीक था कि जब ईश्वर स्वयं कोई कार्य करना चाहते हैं, तो प्रकृति भी उनकी सहायक बन जाती है। वासुदेव ने गोकुल पहुँचकर कृष्ण को यशोदा के पास सुला दिया और उनकी नवजात पुत्री को लेकर वापस मथुरा के कारागार में आ गए। इस प्रकार भगवान कृष्ण का जन्म अत्याचार और अंधकार के मध्य एक उम्मीद की किरण बनकर हुआ, जो यह संदेश देता है कि चाहे रात्रि कितनी भी गहरी क्यों न हो, प्रभात अवश्य होता है।
आध्यात्मिक और दार्शनिक महत्व
जन्माष्टमी का त्योहार मनुष्य को गहरे आध्यात्मिक अर्थ से जोड़ता है। श्री कृष्ण के जन्म की इस कथा में प्रत्येक पात्र और प्रत्येक घटना का एक प्रतीकात्मक अर्थ है:
- कारागार: यह हमारे सांसारिक बंधनों का प्रतीक है। हम सभी अपनी इच्छाओं, मोह, और अहंकार के कारागार में कैद हैं।
- देवकी: हमारा शरीर देवकी का प्रतीक है।
- वासुदेव: हमारी चेतना या प्राण (जीवन शक्ति) वासुदेव के प्रतीक हैं।
- कृष्ण: जब शरीर (देवकी) और चेतना (वासुदेव) का मिलन होता है, तब हमारे भीतर आनंद, अर्थात कृष्ण का जन्म होता है। कृष्ण निश्छल प्रेम और दिव्य आनंद के स्वरूप हैं।
- कंस: हमारा अहंकार ही कंस है, जो इस आनंद को, इस कृष्ण को, हमसे दूर रखना चाहता है और उसे नष्ट करने का प्रयास करता है।
इस प्रकार, जन्माष्टमी का व्रत और जागरण केवल एक परम्परा नहीं, बल्कि अपने भीतर के कंस (अहंकार) को क्षीण करके, अपने भीतर के कृष्ण (आनंद) को जागृत करने की एक आध्यात्मिक साधना है।
श्री कृष्ण को ‘पूर्णावतार’ कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने जीवन के प्रत्येक रूप को जिया और उसे एक उत्सव बनाया। वे एक नटखट बालक थे, एक प्रेमी थे, एक अद्भुत मित्र थे, एक कुशल राजनीतिज्ञ थे, और श्रीमद्भगवद्गीता के रूप में विश्व के सबसे बड़े दार्शनिक गुरु भी थे। उनका जीवन हमें सिखाता है कि अध्यात्म का अर्थ संसार से पलायन करना नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए, अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए, निष्काम भाव से जीवन जीना है। उनका प्रेम का संदेश, जो उन्होंने राधा और गोपियों के साथ अपनी लीलाओं में दिया, यह बताता है कि ईश्वर को प्राप्त करने का सबसे सरल मार्ग भक्ति और प्रेम का है।
उत्सव के विभिन्न रंग: सांस्कृतिक जश्न
सम्पूर्ण भारत में जन्माष्टमी को विभिन्न रीतियों से मनाया जाता है, जो इस देश की अद्भुत सांस्कृतिक विविधता को दर्शाता है:
- व्रत और रात्रि जागरण: भक्त इस दिन अनुशासन और भक्ति के प्रतीक के रूप में उपवास रखते हैं। कुछ लोग निर्जला (बिना जल के) व्रत रखते हैं, तो कुछ फलाहारी व्रत करते हैं। रात्रि भर मंदिरों में जागरण होता है, भजन-कीर्तन गाए जाते हैं, और ठीक मध्यरात्रि में, कृष्ण के जन्म के समय, विशेष आरती और पूजा की जाती है। बाल गोपाल की मूर्ति को दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से स्नान कराया जाता है, जिसे ‘अभिषेक’ कहते हैं, और फिर उन्हें नवीन वस्त्र पहनाकर पालने में झुलाया जाता है।
- दही-हांडी: महाराष्ट्र और आस-पास के क्षेत्रों में जन्माष्टमी के अगले दिन दही-हांडी का जश्न पूरे जोश और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इसमें, मिट्टी की एक मटकी में दही, मक्खन, और धनराशि भरकर उसे काफी ऊंचाई पर लटका दिया जाता है। “गोविंदा” कहलाने वाले युवाओं की टोलियाँ एक-दूसरे पर चढ़कर एक मानव पिरामिड बनाती हैं और उस मटकी को तोड़ने का प्रयास करती हैं। यह परम्परा बाल कृष्ण की माखन चोरी की लीलाओं का स्मरण कराती है। यह केवल एक खेल नहीं, बल्कि एकता, साहस, और लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए मिल-जुलकर कार्य करने का संदेश देता है।
- रास लीला: मथुरा और वृन्दावन, वे पवित्र स्थल जहाँ कृष्ण ने अपना बचपन और यौवन बिताया, वहाँ जन्माष्टमी एक अलग ही रंग में रंगी होती है। यहाँ “रास लीला” का आयोजन किया जाता है, जो एक प्रकार का भक्ति-नाटक है। इसमें कलाकार श्री कृष्ण और राधा के मध्य के दिव्य प्रेम और गोपियों के साथ उनके नृत्य को नाटक के रूप में प्रस्तुत करते हैं। यह दृश्य दर्शकों को भक्ति-रस में डुबो देता है और उन्हें आत्मा और परमात्मा के मिलन का अनुभव कराता है।
- छप्पन भोग: अनेक मंदिरों और घरों में भगवान कृष्ण को छप्पन विभिन्न प्रकार के व्यंजनों का भोग लगाया जाता है। इस परम्परा के पीछे भी एक कथा है। ऐसा माना जाता है कि जब इंद्र ने क्रोधित होकर व्रज पर मूसलाधार वर्षा की थी, तब बाल कृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर सम्पूर्ण गोवर्धन पर्वत उठाकर सभी व्रजवासियों की रक्षा की थी। सात दिनों तक उन्होंने बिना कुछ खाए-पिए पर्वत को उठाए रखा। आठवें दिन, जब इंद्र का अहंकार टूटा और वर्षा रुकी, तो सभी व्रजवासियों ने प्रेम और कृतज्ञता से प्रत्येक दिन के आठ प्रहर के हिसाब से सात दिनों के लिए छप्पन प्रकार के पकवान बनाकर कृष्ण को खिलाए। तब से यह छप्पन भोग की परम्परा चली आ रही है।
आज के समय में जन्माष्टमी की प्रासंगिकता
आज के भाग-दौड़ भरे जीवन में, जन्माष्टमी का त्योहार और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। यह हमें स्मरण कराता है कि हमारे भीतर भी एक कृष्ण है – आनंद, प्रेम और ज्ञान का स्रोत। यह हमें अपने भीतर के कंस – हमारे क्रोध, अहंकार, भय और चिंता – से लड़ने की प्रेरणा देता है। दही-हांडी का उत्सव हमें सिखाता है कि बड़े से बड़े लक्ष्य को भी सामूहिक प्रयास और एकता से प्राप्त किया जा सकता है। गीता में दिया गया उनका निष्काम कर्म का सिद्धांत हमें तनाव-मुक्त जीवन जीने की कला सिखाता है।
अतः, जन्माष्टमी केवल एक अवकाश या परम्परा नहीं है, यह अपने जीवन को एक नई दिशा देने का अवसर है। यह एक अवसर है, श्री कृष्ण की लीलाओं के आनंद में डूबने का, उनकी शिक्षाओं पर चिंतन करने का, और अपने जीवन को धर्म, प्रेम और आनंद के मार्ग पर आगे बढ़ाने का। क्योंकि जब हम अपने भीतर कृष्ण को जागृत कर लेते हैं, तो हमारा जीवन ही एक उत्सव बन जाता है।
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FAQs
Janmashtami ka tyohar kya hai aur yeh kab manaya jaata hai?
Janmashtami, Bhagwan Vishnu ke aathvein avatar, Shri Krishna ka janamdin hai. Yeh Hindu calendar ke anusaar, Bhadrapad mahine ke Krishna Paksha ki ashtami (aathvi) tithi ko manaya jaata hai. Yeh tyohar poore Bharat mein badi dhoom-dhaam se celebrate kiya jaata hai.
Hum Janmashtami kyu manate hain? Iska mool kaaran kya hai?
Janmashtami manane ka sabse bada kaaran hai ‘adharm par dharm ki jeet’ ka jashn manana. Yeh Shri Krishna ke uss janm ki yaad dilata hai jo unhone Mathura ke atyachari raja Kansa ka ant karne ke liye liya tha. Isliye, yeh tyohar burai par acchai ki jeet ka prateek hai.
Kansa kaun tha aur Janmashtami se uska kya sambandh hai?
Kansa Mathura ka ek kroor raja tha aur Shri Krishna ki maa, Devaki ka bhai tha. Ek akashvani hui thi ki Devaki ki aathvi santaan hi Kansa ko maaregi. Is dar se Kansa ne Devaki aur Vasudev ko jail mein band kar diya tha aur unke saat bachchon ko maar diya tha. Krishna unki aathvi santaan the, jinhone baad mein Kansa ka vadh kiya.
Janmashtami ka adhyatmik (spiritual) matlab kya hai?
Adhyatmik roop se, is kahani ka gehra matlab hai. Ismein, Kansa hamare ahankar (ego) ka prateek hai, Devaki hamare shareer ka, aur Vasudev hamari chetna (praan) ka. Jab shareer aur chetna milte hain, toh anand yaani Krishna ka janm hota hai. Toh Janmashtami apne ahankar ko kam karke apne andar ke anand ko jagane ka prateek hai.
Janmashtami par kya-kya khaas riti-riwaj hote hain?
Is din log vrat (upvas) rakhte hain. Raat ke theek 12 baje, Krishna ke janam ke samay, vishesh puja aur aarti ki jaati hai. Gharon aur mandiron mein Krishna ke bachpan ki jhaankiyan sajai jaati hain aur Bal Gopal ko paalne mein jhulaya jaata hai.
Dahi Handi kya hai aur yeh kyu manayi jaati hai?
Dahi Handi, khaas kar Maharashtra mein, Janmashtami ka ek bahut hi joshila hissa hai. Ismein dahi se bhari ek matki ko unchai par latkaya jaata hai aur ‘Govinda’ (ladko ke group) ek human pyramid banakar use todte hain. Yeh Shri Krishna ke natkhat bachpan ki yaad dilata hai jab woh apne doston ke saath makhan chori karte the.
Raas Leela kise kehte hain?
Raas Leela ek tarah ka bhakti-natak aur nritya hai, jo khaas taur par Mathura aur Vrindavan mein hota hai. Ismein kalakar, Shri Krishna aur Radha ke divya prem aur gopiyon ke saath unke nritya ko dikhate hain.
‘Chappan Bhog’ ka kya mahatva hai?
Chappan (56) Bhog ka matlab hai 56 tarah ke vyanjan jo Krishna ko arpit kiye jaate hain. Maana jaata hai ki jab Krishna ne Govardhan parvat uthakar Vrajvasiyon ko Indra ke krodh se bachaya tha, tab Vrajvasiyon ne unke liye saat dinon tak, har din aath prahar ke hisaab se 56 tarah ke bhojan banakar unhe khilaye the.
Aaj ke samay mein Janmashtami hamein kya sikhati hai?
Aaj ki life mein Janmashtami hamein sikhati hai ki hum apne andar ke Kansa, yaani gussa, ego aur stress se lad. Yeh hamein team work (Dahi Handi ki tarah) aur bina tension ke apne kaam karte rehne (Gita ke nishkam karma) ki prerna deti hai. Yeh tyohar life ko ek utsav ki tarah jeene ka sandesh deta hai.